कैसे कहुँ मैं लौटादो बचपन : वरिष्ठ लेखक ” मन ” साहब के शब्दों में व्यक्त वेदना

“ बचपन “

धूप में भूख से बिलखता बचपन ,
बारिश में पानी को तरसता बचपन |

भीड़ में अपनों को खोजता बचपन ,
महफिलों में बिखरा अकेला बचपन |

अमीरों से भीख की उम्मीद में बचपन ,
मतलबी दुनियाँ में ख़्वाहिशी बचपन |

भागते युग में ठहरा सा बचपन ,
शिक्षित समाज में अनपढ़ बचपन |

बादलों के साथ रोता बचपन ,
हर रात कफ़न ओड़ सोता बचपन |

खयालों की दुनियाँ में उड़ता बचपन ,
मर चुकीं निगाहों में गुनेहगार बचपन |

तंग सी गलिओं में बिकता बचपन ,
उम्र से पहले जवां होता बचपन |

कैसे कहुँ मैं लौटादो बचपन ,
आज़ाद है “मन” पर कैद है बचपन |

:- मनिंदर सिंह भाटिया ” मन “