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शेरो शायरी

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“ बचपन “ धूप में भूख से बिलखता बचपन , बारिश में पानी को तरसता बचपन | भीड़ में अपनों को खोजता बचपन , महफिलों में बिखरा...
  ज़िंदगी ज़िंदगी अपनी तमाशा ना बना बैठो तुम , इसलिए तुमको आगाह किये जाते हैं | उँगलियाँ उठ ना सके गैर इरादे से कभी , तुम्हारी चाहतों पर निगाह किये जाते हैं || कौन कहता है ज़माने से जुदा तुम भी रहो , ना किसी...
  भिलाई | जगजीत सिंह |     भिलाई इस्पात संयंत्र के स्टील मेल्टिंग शॉप-1 में कार्यरत्  प्रकाश चन्द्र मण्डल बांग्लादेश में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय साहित्य और संस्कृति सम्मेलन में सम्मानित होकर इस्पात बिरादरी को गौरवान्वित किया है। उल्लेखनीय है कि विश्वबंग साहित्य...
         "रेत के ख्वाब" रेत के ख्वाब डूब गए आँधियो में , हँसने लगी तन्हाईयाँ , रंग बदलकर इतराने लगी , जैसे चिड़ाने लगी गिरगिट |   शाख पर बैठे पत्ते भी , तालियां बजाने लगे, कुछ थम कर, कुछ सोच कर, मुस्कुराती हवाएँ |   बादल उमड़ आए आँखों में...
"वो शब्द" वो शब्द जो "मन" कहना चाहता था , वो शब्द जिन्हें मैं सुनना चाहता था , वो शब्द जो ह्रदय में थे कहीं, वो  शब्द जो कानो के इर्द गिर्द थे कहीं , वो शब्द जो अब अनजान नज़र आते है , वो ...
"सपने " बचपन के दिन बड़े सुहाने , सुंदर सपनो का संसार , गीत-मीत सब मिलकर गाए, फूल खिले है मस्त बहार | पल छीन पल छीन पवन झकोरे , डोर रही है डाली डाली , मेघ गरज बदल संग बरसे , चहु ओर छाई हरियाली | बाल...
  "अंतर " अंतर पीड़ा उभर लहर, जस ज्वाला दहके , कुंठित कंठ सुखाय , बूंद तृष्णा को तरसे , ह्रदय ग्राहय गंभीर, चिन्तनी काया जर जर, विचलित व्यथा पात, तरुबर जस पड़ते झर झर, विस्म्रत स्वपन सृजन, पटल पर बरबस ढलके , कुंठित कंठ सुखाय,...
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