डॉ. अशोक कुमार वर्मा । रविवार का दिन था। दोपहर का भोजन करने के बाद मैं कुछ देर विश्राम कर रहा था कि अचानक मोबाइल फोन की घंटी बज उठी मैंने फोन उठाया। दूसरी ओर एक युवती थी। उसकी आवाज़ में व्याकुलता, पीड़ा और आशा—तीनों का अद्भुत संगम था।
उसने संकोच भरे स्वर में पूछा, "सर, क्या आप मुझे पहचानते हैं?"
मैंने स्नेहपूर्वक उत्तर दिया, "नहीं, कृपया आप अपना परिचय दीजिए।"
वह बोली, "सर, पिछले वर्ष आप हमारे विद्यालय में नशा मुक्ति जागरूकता कार्यक्रम के लिए आए थे। उस समय मैं बारहवीं कक्षा में पढ़ती थी। आज मेरे विवाह को चार महीने हो चुके हैं, लेकिन मैं बहुत बड़ी परेशानी में हूँ।" उसकी वाणी में छिपी पीड़ा इतनी गहरी थी कि मैं पूरी गंभीरता और संवेदनशीलता के साथ उसकी बातें सुनने लगा। उसने बताया कि उसके पिता का पहले ही निधन हो चुका था। उसकी माँ लंबे समय से अस्वस्थ रहती हैं। परिवार की आर्थिक एवं सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए उसकी पढ़ाई पूरी होते ही उसका विवाह कर दिया गया, ताकि उसका भविष्य सुरक्षित हो सके। किन्तु विवाह के कुछ ही दिनों बाद उसे एक ऐसी सच्चाई का पता चला, जिसने उसके सभी सपनों को चकनाचूर कर दिया। उसका मात्र बीस वर्षीय पति चिट्टा (स्मैक) का आदी था। यह गंभीर तथ्य विवाह से पहले उससे और उसके परिवार से पूरी तरह छिपाया गया था। रुँधे हुए गले से उसने कहा, "सर, यदि हमें पहले यह सच्चाई पता होती, तो शायद यह विवाह कभी नहीं होता।"
उसने आगे बताया कि उसके पति के पिता का भी निधन हो चुका है। परिवार में उसकी सास, दादी और एक छोटा देवर हैं। परिवार के सदस्यों ने कई बार उसका उपचार कराने का प्रयास किया, किन्तु स्थायी सफलता नहीं मिल सकी। उसका पति स्वयं भी नशा छोड़ना चाहता है, परंतु लत इतनी गहरी हो चुकी है कि वह हर बार हार जाता है। उसकी पीड़ा सुनकर मेरा मन अत्यंत व्यथित हो उठा। मैंने उसे समझाया कि नशे की लत एक मानसिक बीमारी है जिसका उपचार सम्भव है। उचित चिकित्सा, मनोवैज्ञानिक परामर्श, दृढ़ इच्छाशक्ति, दृढ़ संकल्प और परिवार के सहयोग से इससे बाहर निकला जा सकता है। मैंने उसे परामर्श दिया कि वह अपने पति को किसी सरकारी अस्पताल के नशा मुक्ति एवं पुनर्वास केंद्र में लेकर जाए, जहाँ विशेषज्ञ चिकित्सकों की देखरेख में दवाओं, मनोवैज्ञानिक परामर्श तथा पुनर्वास की समुचित व्यवस्था उपलब्ध होती है। यदि कोई समस्या आए तो दोबारा फ़ोन करके बताएं ताकि उचित रूप से उपचार कराया जा सके।
फोन के अंत में युवती ने धीमे और भावुक स्वर में कहा,
"सर, मैं पूरी कोशिश करूँगी। भगवान करे मेरा परिवार बिखरने से बच जाए।"
फोन तो कट गया, लेकिन उसकी आवाज़ लंबे समय तक मेरे हृदय पटल पर गूँजती रही।
यह केवल एक युवती की व्यथा नहीं थी, बल्कि उन असंख्य परिवारों की सच्ची कहानी थी जो आज नशे की भयावह समस्या के कारण टूट रहे हैं। नशा केवल एक व्यक्ति का जीवन ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार की खुशियाँ, विश्वास, रिश्ते, सम्मान और भविष्य को भी धीरे-धीरे निगल जाता है। समय पर उपचार, परिवार का सहयोग, समाज की संवेदनशीलता और व्यापक जन-जागरूकता ही ऐसे परिवारों को टूटने से बचा सकती है। इस वार्तालाप ने मेरे मन में एक और गंभीर सामाजिक समस्या को भी उजागर किया।
प्रायः देखने में आता है कि जब कोई युवक गलत संगति, नशे अथवा अन्य बुरी आदतों के कारण भटक जाता है, तो कुछ परिवार यह सोचकर उसका विवाह कर देते हैं कि "शादी के बाद वह अपने-आप सुधर जाएगा।" यह सोच न केवल भ्रमपूर्ण है, बल्कि अनेक बार दो परिवारों के जीवन को गहरे संकट में डाल देती है। विवाह किसी व्यक्ति को सुधारने का माध्यम नहीं, बल्कि दो व्यक्तियों और दो परिवारों के बीच विश्वास, उत्तरदायित्व, सम्मान और जीवनभर के साथ का पवित्र बंधन है। यदि कोई युवक या युवती नशे जैसी गंभीर समस्या से जूझ रहा हो, तो सबसे पहले उसका समुचित उपचार, मनोवैज्ञानिक परामर्श और पुनर्वास कराया जाना चाहिए। जब वह शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से स्वस्थ तथा जिम्मेदार जीवन जीने के योग्य हो जाए, तभी विवाह जैसे महत्वपूर्ण निर्णय पर विचार करना उचित है। नशे की समस्या को छिपाकर किया गया विवाह केवल एक व्यक्ति के साथ नहीं, बल्कि दो परिवारों के विश्वास और भविष्य के साथ भी अन्याय है। समाज को इस विषय में जागरूक होना होगा। माता-पिता और अभिभावकों को यह समझना चाहिए कि विवाह किसी समस्या का उपचार नहीं है। यदि हम समय रहते सही निर्णय लें, तो अनेक निर्दोष युवाओं का जीवन बर्बाद होने से बचाया जा सकता है और अनेक परिवार टूटने से बच सकते हैं।
(क्रमशः...)
भाग–13 में पढ़िए :
क्या युवक नशा मुक्ति केंद्र जाने के लिए तैयार हुआ? क्या उपचार के बाद उसके जीवन में परिवर्तन आया? क्या यह परिवार टूटने से बच सका?