V CAN न्यूज। महात्मा गांधी का जीवन सत्य, अहिंसा, सदाचार, करुणा और मानवता के उच्च आदर्शों का प्रतीक रहा है। उनके विचारों ने न केवल भारत के स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा प्रदान की, बल्कि संपूर्ण विश्व को सत्य, शांति और नैतिकता का मार्ग दिखाया। बापू के तीन बंदरों की प्रतिमाएं आज भी उनके विचारों का अत्यंत सरल, किंतु प्रभावशाली प्रतीक मानी जाती हैं। पहला बंदर अपनी आंखें बंद किए हुए है और संदेश देता है—“बुरा मत देखो।” दूसरा अपने कान बंद किए हुए है—“बुरा मत सुनो।” तीसरा अपने मुख पर हाथ रखे हुए है—“बुरा मत बोलो।” इन तीनों संदेशों में मनुष्य के दृष्टि, श्रवण और वाणी पर संयम रखने की प्रेरणा निहित है। किंतु वर्तमान समय की परिस्थितियों को देखते हुए ऐसा अनुभव होता है कि बापू के इन तीन बंदरों के साथ एक चौथा बंदर भी होना चाहिए, जो अपने मस्तिष्क और मन की ओर संकेत करते हुए कहे—“बुरा मत सोचो।” वास्तव में मनुष्य के प्रत्येक आचरण का आरंभ उसके विचारों से होता है। विचार ही धीरे-धीरे भावना बनते हैं, भावना से व्यवहार उत्पन्न होता है और व्यवहार से चरित्र का निर्माण होता है। इसलिए यदि विचार शुद्ध, सकारात्मक, रचनात्मक और मानवतावादी होंगे तो वाणी और कर्म भी उसी दिशा में आगे बढ़ेंगे।
आज मनुष्य बाहरी संसार को सुधारने और नियंत्रित करने का निरंतर प्रयास कर रहा है, किंतु अपने अंतर्मन में उठने वाले विचारों पर पर्याप्त ध्यान नहीं देता। मन में उत्पन्न ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, अहंकार, प्रतिशोध और दुर्भावना धीरे-धीरे व्यक्ति के मानसिक संतुलन को प्रभावित करते हैं। कई बार हम किसी व्यक्ति को केवल उसके संबंध में सुनी गई बातों के आधार पर अच्छा या बुरा मान लेते हैं। बिना सत्य जाने किसी के प्रति धारणा बना लेना, बिना प्रमाण किसी पर दोष लगाना और मन में किसी के प्रति शत्रुता रखना हमारे स्वयं के अंतर्मन को दूषित करता है। आज संचार के साधनों की तीव्रता ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। दूर बैठे व्यक्ति के संबंध में क्षण भर में कोई सूचना हमारे पास पहुंच जाती है। अनेक बार असत्य, अपूर्ण अथवा भ्रामक जानकारी को लोग बिना जांचे आगे बढ़ा देते हैं। परिणामस्वरूप एक व्यक्ति के प्रति अनेक लोगों के मन में अनावश्यक संदेह और दुर्भावना उत्पन्न हो जाती है। इसलिए आज “बुरा मत सोचो” का संदेश पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है। इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि हम अन्याय, अपराध अथवा गलत कार्यों को देखकर मौन रहें। अन्याय का विरोध करना और सत्य का साथ देना हमारा कर्तव्य है। “बुरा मत सोचो” का वास्तविक अर्थ है—बिना कारण किसी के प्रति दुर्भावना न रखना, बिना प्रमाण किसी के संबंध में अनुचित धारणा न बनाना और अपने अंतर्मन को घृणा तथा द्वेष का निवास स्थान न बनने देना।
मनुष्य के जीवन में क्षमा, सहनशीलता और विवेक का विशेष महत्व है। यदि कोई हमारे साथ अनुचित व्यवहार करता है तो उसका उत्तर प्रतिशोध की भावना से देना समस्या को और बढ़ा सकता है। क्षमा का अर्थ अन्याय को स्वीकार करना नहीं, बल्कि अपने मन को प्रतिशोध की अग्नि से बचाना है। इसी प्रकार सकारात्मक विचारों का अर्थ यह भी नहीं कि हम जीवन की कठिनाइयों और वास्तविक समस्याओं से आंखें मूंद लें। सकारात्मक विचार वह शक्ति है, जो कठिन परिस्थिति में भी मनुष्य को धैर्य, विवेक और समाधान की दिशा में आगे बढ़ाती है। यदि हम प्रत्येक परिस्थिति में केवल दोष खोजेंगे तो हमारे भीतर असंतोष बढ़ता जाएगा; लेकिन यदि हम समस्या के साथ उसके समाधान पर भी विचार करेंगे तो जीवन अधिक संतुलित और सार्थक बनेगा। विशेष रूप से बच्चों और युवाओं के जीवन में विचारों की शुद्धता का महत्व अत्यधिक है। परिवार और विद्यालय केवल ज्ञान प्रदान करने के स्थान नहीं हैं, बल्कि वे चरित्र और संस्कार निर्माण के प्रमुख केंद्र भी हैं। बच्चों को यह सिखाना आवश्यक है कि किसी के रूप, वेश, आर्थिक स्थिति, सफलता अथवा असफलता के आधार पर उसके प्रति पूर्वधारणा न बनाएं। दूसरों की सफलता से ईर्ष्या करने के स्थान पर उससे प्रेरणा लें और किसी की कठिनाई देखकर उपहास करने के स्थान पर सहायता का भाव रखें। यदि बाल्यावस्था से ही सत्य, संयम, करुणा, सहिष्णुता, सेवा और सद्भाव जैसे गुणों का विकास किया जाए तो वही बालक आगे चलकर संवेदनशील, उत्तरदायी और श्रेष्ठ नागरिक बन सकता है।
आज समाज को बापू के तीन बंदरों के संदेश को केवल प्रतिमाओं तक सीमित रखने के स्थान पर अपने जीवन का आचरण बनाना होगा। आंखों को बुराई देखने से रोकना, कानों को बुराई सुनने से बचाना और वाणी को बुराई बोलने से रोकना जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक अपने मन को बुरे विचारों से मुक्त रखना भी है। क्योंकि बुरा विचार ही अनेक बार बुरे शब्द का रूप लेता है, बुरा शब्द बुरे व्यवहार को जन्म देता है और बुरा व्यवहार अंततः किसी बड़े अनर्थ का कारण बन सकता है। इसलिए आज आवश्यकता है कि बापू के तीन बंदरों के साथ हम चौथे बंदर के संदेश को भी अपने जीवन में स्थान दें—“बुरा मत सोचो।” अपने मन में किसी के लिए घृणा नहीं, सद्भाव रखें; प्रतिशोध नहीं, क्षमा रखें; ईर्ष्या नहीं, प्रेरणा रखें; निराशा नहीं, आशा रखें। आइए, हम यह संकल्प लें कि हम बुरा देखने, बुरा सुनने और बुरा बोलने से बचने के साथ-साथ बुरा सोचने से भी बचेंगे। हम सत्य सोचेंगे, शुभ सोचेंगे, मानवता के कल्याण की सोचेंगे और अपने विचारों को ऐसे कर्मों का आधार बनाएंगे, जिनसे परिवार, समाज और राष्ट्र में प्रेम, शांति, सद्भाव तथा भाईचारा सुदृढ़ हो। यही बापू के संदेश की वास्तविक सार्थकता और स्वस्थ मन, श्रेष्ठ चरित्र तथा सभ्य समाज के निर्माण की सच्ची दिशा है।