नई दिल्ली | न्यूज़ डेस्क | भारत के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो केवल पद से नहीं, बल्कि अपने ज्ञान और चरित्र से देश का गौरव बनते हैं। भारत के द्वितीय राष्ट्रपति, भारत रत्न डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ऐसे ही युग-पुरुष थे। वे एक ऐसे शिक्षक थे जो राष्ट्रपति भवन तक पहुँचे और एक ऐसे राष्ट्रपति थे जो अंत तक शिक्षक ही रहे।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
डॉ. राधाकृष्णन का जन्म 5 सितम्बर 1888 को तमिलनाडु के तिरुत्तनी नामक छोटे से कस्बे में एक गरीब तेलुगु ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम सर्वपल्ली वीरास्वामी था। परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, पर बालक राधाकृष्णन बचपन से ही अत्यंत मेधावी थे। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा तिरुवन्नामलाई और वेल्लोर से प्राप्त की और बाद में मद्रास के क्रिश्चियन कॉलेज में दर्शनशास्त्र में एम.ए. किया। कहते हैं कि जब वे छात्र थे, तो एक ईसाई मिशनरी ने हिंदू धर्म की आलोचना की, तभी उन्होंने ठान लिया था कि वे भारतीय दर्शन को पूरी दुनिया में गौरवान्वित करेंगे।

एक महान दार्शनिक के रूप में राधाकृष्णन केवल शिक्षक नहीं, विश्व-प्रसिद्ध दार्शनिक थे। उनकी प्रमुख रचनाएँ - 'भारतीय दर्शन' (Indian Philosophy), 'भगवद्गीता की व्याख्या' और 'हिंदू जीवन-दृष्टि' - आज भी दुनिया के विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती हैं।उन्होंने भारतीय वेदांत को पश्चिमी दुनिया के सामने तर्क और विज्ञान की कसौटी पर प्रस्तुत किया। उनका मानना था कि धर्म अंधविश्वास नहीं, बल्कि बौद्धिक अनुभूति है। उन्होंने कहा था - "धर्म भय पर नहीं, बल्कि सत्य की खोज पर आधारित होना चाहिए।" उनकी विद्वता के कारण उन्हें 1929 में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बनने का निमंत्रण मिला और वे ऑक्सफोर्ड में पूर्वी धर्म और नीतिशास्त्र के पहले भारतीय प्रोफेसर बने।
शिक्षक से राष्ट्रपति तक की यात्रा उनका जीवन एक आदर्श क्रम में आगे बढ़ा -
1. शिक्षक के रूप में: उन्होंने मैसूर और कलकत्ता विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र पढ़ाया। वे आंध्र विश्वविद्यालय और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के कुलपति भी रहे।
2. राजनयिक के रूप में: स्वतंत्रता के बाद नेहरू जी ने उन्हें सोवियत संघ में भारत का राजदूत बनाकर भेजा। रूस में भी उनकी विद्वता का लोहा माना गया। स्वयं स्टालिन ने कहा था - "आप जैसे शिक्षक के सामने हम कुछ नहीं।"
3. उपराष्ट्रपति और राष्ट्रपति के रूप में: 1952 से 1962 तक वे भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति रहे और 1962 से 1967 तक भारत के द्वितीय राष्ट्रपति रहे। राष्ट्रपति भवन में रहते हुए भी उनकी सादगी, विद्वता और शाकाहारी जीवनशैली वैसी ही बनी रही।
शिक्षक दिवस - उनके नाम
उनके जीवन की सबसे सुंदर घटना 1962 की है। जब वे राष्ट्रपति बने, तो उनके कुछ छात्र और मित्र उनका जन्मदिन मनाना चाहते थे। तब डॉ. राधाकृष्णन ने कहा "मेरे जन्मदिन को मेरे व्यक्तिगत जन्मदिन के रूप में मनाने के बजाय, इसे शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाए तो मुझे गर्व होगा।" तभी से 5 सितंबर को पूरे भारत में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दर्शाता है कि राष्ट्रपति के सर्वोच्च पद पर पहुँचकर भी वे खुद को सबसे पहले एक शिक्षक ही मानते थे।
विचार और प्रेरणा
डॉ. राधाकृष्णन का जीवन हमें तीन बड़ी सीख देता है -
1. ज्ञान ही सच्ची शक्ति है: गरीबी शिक्षा में बाधा नहीं बन सकती।
2. भारतीय संस्कृति पर गर्व: उन्होंने कभी पश्चिमी चकाचौंध में अपनी भारतीयता नहीं छोड़ी।
3. चरित्र की विनम्रता: विश्व-प्रसिद्ध होने के बाद भी वे एक विनम्र शिक्षक बने रहे।
1954 में उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित किया गया और 1963 में ब्रिटेन ने उन्हें 'Order of Merit' दिया।
17 अप्रैल 1975 को इस महान आत्मा का परलोक गमन हो गया , पर उनका दिया हुआ ज्ञान-दीप आज भी प्रज्वलित है।
अंत में उनके ही शब्दों में - "पुस्तकें वो साधन हैं जिनके द्वारा हम विभिन्न संस्कृतियों के बीच पुल का निर्माण कर सकते हैं।" ऐसे महान व्यक्तित्व, दार्शनिक एवं सर्वश्रेष्ठ शिक्षाविद को शत-शत नमन।