डॉ. अशोक कुमार वर्मा । सड़कें किसी भी देश की विकास यात्रा का महत्त्वपूर्ण आधार हैं। प्रतिदिन लाखों वाहन इन सड़कों पर चलते हैं और करोड़ों लोग अपने गंतव्य तक पहुँचते हैं। यातायात को सुरक्षित, सुचारु और व्यवस्थित बनाने के लिए सड़कों पर सफेद और पीली पट्टियाँ बनाई जाती हैं, संकेतक लगाए जाते हैं तथा प्रत्येक श्रेणी के वाहन के लिए नियम निर्धारित किए जाते हैं। इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य केवल यातायात को गति देना नहीं, बल्कि दुर्घटनाओं को रोकना और प्रत्येक व्यक्ति के जीवन की रक्षा करना है। इसके बावजूद सड़कों पर अनेक वाहन चालक अपनी मनमर्जी से वाहन चलाते दिखाई देते हैं। प्रश्न यह है कि जब नियम निर्धारित हैं, सड़क पर पट्टियाँ बनी हैं और यातायात संकेत मौजूद हैं, तो उनका पालन सुनिश्चित क्यों नहीं हो पा रहा है?
बहुपट्टीय सड़कों पर प्रत्येक पट्टी का अपना महत्त्व होता है। भारी तथा वाणिज्यिक वाहनों को निर्धारित यातायात व्यवस्था के अनुसार बाईं ओर चलना चाहिए। तेज गति से चलने वाले वाहनों और आगे निकलने की प्रक्रिया के लिए भी नियम निर्धारित हैं। दोपहिया वाहन चालकों को अपनी सुरक्षा और सड़क की परिस्थितियों के अनुसार उचित स्थान पर चलना चाहिए। इसके बावजूद अनेक ट्रक, बस और मालवाहक वाहन बीच की अथवा दाईं पट्टी में लंबे समय तक चलते रहते हैं। कुछ चालक बिना संकेत दिए पट्टी बदलते हैं, तो कुछ आगे निकलने के बाद अपनी निर्धारित पट्टी में वापस नहीं आते। दोपहिया वाहन चालक भी कई बार भारी वाहनों के बीच से निकलने का प्रयास करते हैं। ऐसी लापरवाही दुर्घटनाओं को आमंत्रित करती है।
इस समस्या का समाधान केवल चालान काटने अथवा दंड देने से नहीं होगा। इसके लिए नियमों के पालन के साथ नियमित प्रशिक्षण, स्वास्थ्य परीक्षण, संस्थागत जवाबदेही और प्रभावी निगरानी की व्यवस्था विकसित करनी होगी। विशेष रूप से उन संस्थानों की जिम्मेदारी निर्धारित करना आवश्यक है, जो अपने कार्यों के लिए ट्रक, बस, मालवाहक वाहन, विद्यालयी वाहन, कर्मचारी परिवहन वाहन अथवा अन्य वाणिज्यिक वाहनों का उपयोग करते हैं। प्रत्येक संस्थान में चालकों और परिचालकों के लिए नियमित प्रशिक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए। संबंधित संस्थान प्रत्येक माह अथवा कम से कम तीन माह में एक बार सभी चालकों और परिचालकों के लिए संक्षिप्त प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करें। इसमें उन्हें समझाया जाए कि सड़क पर वाहन किस प्रकार चलाना है, निर्धारित पट्टी का उपयोग कैसे करना है, पट्टी बदलने से पहले संकेत देना क्यों आवश्यक है, सुरक्षित दूरी कैसे बनाए रखनी है और आगे निकलते समय किन सावधानियों का पालन करना है। उन्हें गति सीमा, यातायात संकेतों, लालबत्ती, पैदल यात्रियों की सुरक्षा और आपातकालीन परिस्थितियों में सही निर्णय लेने की जानकारी भी दी जाए।
प्रशिक्षण में ओवरलोडिंग से बचने पर विशेष बल दिया जाना चाहिए। निर्धारित क्षमता से अधिक भार लेकर चलने वाले वाहन न केवल सड़क और वाहन को नुकसान पहुँचाते हैं, बल्कि चालक के नियंत्रण, वाहन की रोकने की क्षमता और यात्रियों की सुरक्षा को भी प्रभावित करते हैं। इसी प्रकार वाहन की नियमित देखभाल, ब्रेक, टायर, प्रकाश व्यवस्था और अन्य आवश्यक उपकरणों की जाँच करना भी चालक की जिम्मेदारी है। परिचालकों को भी भार की स्थिति, यात्रियों की सुरक्षा और यात्रा के दौरान नियमों के पालन के प्रति जागरूक बनाया जाना चाहिए।
एक अन्य गंभीर विषय है चालक की नींद और थकान। कई बार चालक समय पर गंतव्य तक पहुँचने के दबाव में रातभर वाहन चलाते रहते हैं और पर्याप्त नींद नहीं लेते। नींद की कमी से ध्यान केंद्रित करने की क्षमता घटती है, प्रतिक्रिया देने में विलंब होता है और वाहन चलाते समय झपकी आने का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए संस्थानों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि चालकों को पर्याप्त विश्राम मिले, उनकी ड्यूटी और यात्रा का समय उचित हो तथा थकान की स्थिति में उन्हें वाहन चलाने के लिए बाध्य न किया जाए। रात की पूरी और पर्याप्त नींद के साथ निर्धारित विश्राम अवधि का पालन सड़क सुरक्षा का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए। इसी प्रकार नशे की अवस्था में वाहन चलाने के विरुद्ध शून्य सहनशीलता की नीति अपनाई जानी चाहिए। चालकों को स्पष्ट बताया जाए कि शराब अथवा अन्य नशीले पदार्थों के प्रभाव में वाहन चलाना स्वयं के साथ-साथ यात्रियों और सड़क पर चलने वाले अन्य लोगों के जीवन को भी खतरे में डालता है। संस्थान अपने स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम चलाएँ और आवश्यकतानुसार कानून के अनुरूप जाँच तथा अनुशासनात्मक कार्रवाई की व्यवस्था करें।
चालकों और परिचालकों के स्वास्थ्य की उपेक्षा भी नहीं की जानी चाहिए। संस्थानों में प्रत्येक माह स्वास्थ्य की प्रारंभिक जाँच कराने की व्यवस्था होनी चाहिए। इसमें रक्तचाप, दृष्टि, मधुमेह के जोखिम तथा अन्य आवश्यक स्वास्थ्य संकेतकों की जाँच चिकित्सकीय सलाह के अनुसार कराई जा सकती है। किसी रोग, शारीरिक व्याधि, अत्यधिक थकान अथवा ऐसी स्वास्थ्य समस्या का पता चलने पर, जो सुरक्षित वाहन संचालन को प्रभावित कर सकती हो, संबंधित व्यक्ति को आवश्यक चिकित्सकीय परामर्श और उपचार उपलब्ध कराया जाए। विस्तृत चिकित्सकीय परीक्षण की आवश्यकता होने पर योग्य चिकित्सक की सलाह के अनुसार जाँच कराई जाए। स्वास्थ्य संबंधी जानकारी की गोपनीयता भी सुरक्षित रखी जानी चाहिए।
अंततः सड़क सुरक्षा केवल पुलिस या परिवहन विभाग का विषय नहीं है, बल्कि यह प्रत्येक नागरिक और संस्थान की सामूहिक जिम्मेदारी है। सड़क पर बनी पट्टियाँ अनुशासन का संदेश देती हैं, जबकि नियमित प्रशिक्षण, पर्याप्त नींद, नशामुक्त वाहन संचालन, निर्धारित भार और स्वास्थ्य परीक्षण सुरक्षित यात्रा की नींव रखते हैं। यदि प्रत्येक वाणिज्यिक संस्थान अपने चालकों और परिचालकों को जिम्मेदार बनाए तथा पुलिस विभाग प्रशिक्षण और निगरानी में सहयोग करे, तो दुर्घटनाओं में कमी लाने की दिशा में ठोस कदम उठाया जा सकता है। नियमों का पालन, स्वस्थ चालक और जिम्मेदार संस्थान—यही सुरक्षित सड़क व्यवस्था की पहचान होनी चाहिए।