" जीवन क्या है? "
कभी आशाओं के दीप जलें,
कभी मन में अँधियारे हों,
कभी सुख के मधुरिम पल आएँ,
कभी दुःख के गलियारे हों।
इच्छाओं की इस दौड़ में,
मन उलझा-सा रह जाता है,
कभी-कभी मानव स्वयं को,
अनसुलझा प्रश्न बन जाता है।
कभी पग में गति आ जाती,
कभी राहें थम जाती हैं,
कभी अधरों पर हँसी खिलती,
कभी आँखें नम हो जाती हैं।
चलते-चलते आयु ढले,
हर पल इतिहास बन जाता है,
जिसे समझने निकले थे हम,
वह जीवन ही बीत जाता है।
शायद जीवन चलने का नाम,
शायद इसका ठहराव भी है,
कभी धूप है, कभी छाँव है,
कभी हर्ष है, कभी तनाव भी है।
जो मिला, उसे स्वीकार करो,
जो छूटा, उसका शोक नहीं,
हर पल जीवन है उत्सव,
जीवन का कोई मोल नहीं।
क्यों खोज रहा जीवन को तू,
दूर गगन के तारों में?
जीवन तो हर साँस में बसता,
अपने ही व्यवहारों में।
हर धड़कन का मान रखो,
हर पल को मुस्कान दो,
दूसरों के जीवन में भी,
खुशियों का वरदान दो।
अब भी मन में प्रश्न यही—
आखिर जीवन क्या कहलाता है?
शायद जीवन एक प्रश्न है,
जिसका उत्तर जीना सिखाता है।
- डॉ अशोक कुमार वर्मा